इसको लेकर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा रामलला की प्राण प्रतिष्ठा सही मुहूर्त में नहीं हो रही है.रामनवमी के दिन यदि रामलला की प्राण प्रतिष्ठा होती तो वह सर्वोत्तम दिन था. शंकराचार्य ने कहा कि स्वामी स्वरूपानंद जी महाराज ने राम मंदिर की लड़ाई न्यायालय में जाकर लड़ी. राम तीर्थ क्षेत्र कमेटी में संघ परिवार का कब्जा हो गया है.धर्माचार्यों द्वारा रामलला की प्राण प्रतिष्ठा पूरे विधि विधान और आस्था के साथ होनी चाहिए थी. लेकिन इसे एक राजनीतिक कार्यक्रम का राजसी स्वरूप दे दिया गया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सहमति से जो प्राण प्रतिष्ठा का कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है. इसमें आयोजन को अपनी धर्मपत्नी के साथ बैठकर पूजा विधान में भाग लेना पड़ता है. लेकिन जो पूजा पाठ हो रही है वह विधि सम्मत नहीं है. इसकी बड़ी तीव्र प्रतिक्रिया अब देश भर में होने लगी है. साधु संत भी मुखर होकर विरोध कर रहे हैं. आयोजन समिति द्वारा जो आमंत्रण पत्र भेजे गए हैं. उसमें जिस तरह से शंकराचार्य और साधू सन्यासियों की उपेक्षा की गई है. उसकी बड़ी तीव्र प्रतिक्रिया सारे देश में शुरू हो गई है. आमंत्रण को लेकर जिस तरह की राजनीति आयोजन समिति द्वारा की जा रही है. उससे अब यह आरोप लगना शुरू हो गए हैंकि राम पथ से राजपथ की यात्रा सुगम बनाने के लिए यह प्राण प्रतिष्ठा का यह कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है. संघ के सभी अनुवांशिक संगठन और भाजपा के जुड़े कार्यकर्ता रामलला की प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम और राम मंदिर निर्माण को लेकर जिस तरह से 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए प्रचार प्रसार कर रहे हैं. उससे कहा जा रहा है कि राम नाम की लूट है लूट सके तो लूट. इस लूट मे धर्म की मर्यादा का हनन हो रहा है. राम को राजनीति का केंद्र बिंदु बनाकर उनको विवादास्पद बनाया जा रहा है. भगवान राम सबके हैं. कड़ कड में भगवान राम बसे हुए हैं. उसकी ठेकेदारी एक तरह से भारतीय जनता पार्टी और विश्व हिंदू परिषद ले रहा है.जिसके कारण लोगों की नाराजगी बढ़ती जा रही है. उसे समय के आंदोलन में जो लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे थे उनकी भी उपेक्षा की गई है. उनमें भी नाराजी देखी जा रही है.रही सही कसर भारतीय जनता पार्टी ने पूरी कर दी है. प्राण प्रतिष्ठा के कार्यक्रम में बुकलेट छापकर कांग्रेस के ऊपर आरोप प्रत्यारोप कर प्राण प्रतिष्ठा के कार्यक्रम को राजनीतिक बना दिया है.धार्मिक ध्रुवीकरण करने का प्रयास किया गया है. 2024 के लोकसभा चुनाव में लाभ प्राप्त करने की जो रणनीति भारतीय जनता पार्टी और संघ के अनुवांशिक संगठनों द्वारा बनाई है. उसके कारण विरोध शुरू हो गया है. प्रमुख कारसेवक और राम मंदिर की लड़ाई लड़ने वाले लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी को भी आमंत्रण देकर उनसे नहीं आने का अनुरोध करके एक तरह से भगवान राम के भक्तों का अपमान किया गया है. शिवसेना के कार सेवक जिन्होंने बावरी मस्जिद का गुम्मज गिराया था. शिवसेना के उद्धव ठाकरे को भी आमंत्रण पत्र नहीं भेजा गया है. जो साधु संत 50 साल से मंदिर की लड़ाई लड़ रहे थे. कई कार सेवक शहीद हुए थे. उनके परिवारों से भी किसी को प्राण प्रतिष्ठा के कार्यक्रम में आमंत्रित नहीं किया गया है. जब इतने बड़े पैमाने पर आमंत्रण दिए गए थे. कई राजनेताओं को बुलाया जा रहा था. तब इस कार्यक्रम में राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति को क्यों आमंत्रण नहीं दिया गया. इसको लेकर भी विवाद शुरू हो गया है. पौराणिक कथाएं हैं लेकिन अहंकार से वशीभूत होकर जाने अनजाने में यह पाप हो रहा है. रामपथ से राजपथ की यात्रा?