प्राइम टाइम

प्राइम टाइम - सपाक्स को लेकर असमंजस की स्थिति बरकरार

Posted by Divyansh Joshi on



मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में सपाक्स की भूमिका को लेकर भले ही संशय बरकरार है, लेकिन यह तय है कि सवर्णों के वोट काटने में यह संगठन महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। एससी/एसटी एक्ट के खिलाफ सवर्णों के भारत बंद में सपाक्स ने अघोषित समर्थन देकर इसका आगाज पहले ही कर दिया है, लेकिन इसी के साथ आरोप लग रहे हैं कि सपाक्स भाजपा की बी टीम की तरह चुनाव में काम करेगा ताकि कांग्रेस के पक्ष में जाने वाले सवर्णों को रोका जा सकता है । गौरतलब है कि सवर्ण आंदोलन का सबसे ज्यादा असर मध्य प्रदेश में ही देखने को मिला था, जिसके पीछे सपाक्स के अघोषित समर्थन को मुख्य कारण बताया जा रहा है। चूंकि काफी लंबे समय से सपाक्स यानी सामान्य, पिछड़ावर्ग अल्पसंख्यक कल्याण समाज, सवर्ण और गैर आरक्षित वर्ग के कर्मचारियों के लिए संघर्ष करता चला आया है, ऐसे में सवर्णों के भारत बंद आंदोलन के जरिए उसने अपनी राजनीतिक भूमि भी तलाशने का काम शुरु कर दिया है। सूत्रों की मानें तो भाजपा ने सपाक्स के लिए फंडिंग की है, ताकि भाजपा से दूरी बना रहे सवर्ण नेताओं और कार्यकर्ताओं को कांग्रेस में जाने से रोका जा सके। भाजपा से दूरी बनाने वाले ये सवर्ण नेता सपाक्स से चुनाव मैंदान में उतरने के लिए तैयार हैं। इससे कांग्रेस एवं अन्य सहयोगी पार्टियों की नींद हराम है, क्योंकि सपाक्स के जरिए भाजपा सवर्ण वोटबैंक को रोके रखने में सफल हो सकती है। सपाक्स पहले ही कह चुका है कि वह राजनीतिक दल बनाकर मध्य प्रदेश की सभी 230 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ेगा अतरू यह तय माना जा रहा है कि इसके जरिए भाजपा सवर्ण नेताओं को साधे रखेगा। इसलिए अनुमान है कि भाजपा के बागी सवर्ण नेता सपाक्स से चुनाव लड़ सकते हैं, जिनसे भाजपा को भी कोई परेशानी नहीं होगी, क्योंकि वो तब कांग्रेस के ही वोट कांटेंगे। इसलिए अभी से कहा जाने लगा है कि सपाक्स भाजपा की बी टीम की तरह काम करेगी और सवर्णों को कांग्रेस में जाने से रोकने के लिए भाजपा की मदद करेगी । जहां तक सपाक्स के सक्रिय होने का सवाल है तो बताया जाता है कि जब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अजाक्स के मंच से यह घोषणा की थी कि उनके रहते कोई माई का लाल प्रमोशन में आरक्षण खत्म नहीं कर सकता। उसी के बाद सपाक्स के अनेक सदस्यों ने खुद को माई का लाल बताते हुए आंदोलन करने की चेतावनी दे डाली थी। इसी बीच सवर्णों के भारत बंद में सपाक्स ने अप्रत्यक्ष रुप से जो भूमिका निभाई उससे यह संदेश गया कि वो अब राजनीतिक तौर पर अपने आपको मजबूत करेंगे और आगे की रणनीति पर काम करेंगे। इसे विडम्बना कहें या महज संयोग कि मध्य प्रदेश में जातीय आधार पर बनाए गए सरकारी कर्मचारी संगठनों को सरकारी मान्यता मिली हुई है। गौरतलब है कि पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह शासन काल में इसकी शुरुआत हुई थी, तब अनुसूचित जाति और जनजाति के सरकारी कर्मचारियों का संगठन अजाक्स बनाया गया था। इसके बाद पिछड़े वर्ग के कर्मचारियों ने अपाक्स बनाया और इसके बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में सपाक्स की नींव रखी गई।