प्राइम टाइम

प्राईम टाईम - लोकतंत्र पर हावी होता वंशवाद

Posted by Divyansh Joshi on



भारत यूं तो दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और यहां देश की जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों की सरकार बनती है लेकिन सत्ता की राजनीति पर कुछ घरानों का वर्चस्व है. वामपंथी दलों को छोड़कर शायद ही कोई दल वंशवाद से अछूता है. कुनबे की राजनीति को लोगों ने सहजता से लेना भी शुरू कर दिया है. मानो वे इसके अभ्यस्त हो चले हैं पंजाब, कश्मीर, महाराष्ट्र, हरियाणा, कर्नाटक, ओडीशा, उत्तराखंड, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, असम, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना- गिनेचुने राज्य ही होंगे जहां हमें वंशानुगत राजनीति के कोई उदाहरण नहीं मिलते. जैसे त्रिपुरा, बंगाल, केरल या दिल्ली और कुछ पूर्वोत्तर के राज्य. गांधी परिवार के अलावा यूपी में यादव परिवार, बिहार में लालू परिवार, पंजाब में बादल, महाराष्ट्र में ठाकरे और पवार, ओडीशा में पटनायक और तमिलनाडु में करुणानिधि परिवार पिछले कई दशकों से भारतीय राजनीति में वंशवाद के सबसे बड़े खिलाड़ी परिवार बने हुए हैं. भारत की संसद पर नजर डालें. ऐसा लगता है कि वो रिश्तेदारों से भरी पड़ी है. देश की 28 फीसदी राज्य सरकारें किसी न किसी राजनैतिक कुनबे के हाथो में ही हैं. मध्यप्रदेश की बात करें तो मध्यप्रदेश का सिंधिया परिवार बीजेपी और कांग्रेस में बंटा हुआ है और पीढ़ी दर पीढ़ी राजनीति में उतरा हुआ है। बिहार में लालू यादव हों या रामविलास पासवान अपनी अगली पीढ़ी तैयार करने में इन नेताओं ने कोई कसर नहीं छोड़ी. अचरज होता है कि इस देश में सबसे बड़े लोकतंत्र का कितना जोरशोर से ढोल बजाया जाता है, चुनाव होते हैं तो लोकतंत्र के महान उत्सव के जैकारे लगने लगते हैं लेकिन बारीकी से देखने पर आप पाएंगे कि ये तो एक तरह से राजे रजवाड़ों की ही कोई प्रतियोगिता सरीखी हो रही है. चुनाव जीतते हैं तो राजतिलक सरीखा हो जाता है. हारते हैं तो हाथ जोड़कर निकल जाते है. हालांकि 2018 में वंशवाद कुछ कम तो हुआ है लेकिन वंशवाद की जड़े इतनी गहरी की इसे निकाल पाना लगभग नामुमकिन है ।